दो लोगों की कुंडलियाँ मिलती-जुलती हों, फिर भी उनके दशक बहुत अलग बीत सकते हैं, क्योंकि जन्म कुंडली बताती है कि जीवन में क्या है और दशा पद्धति बताती है कि उसका हर हिस्सा कब फल देगा। ज्योतिष की अनेक दशा पद्धतियों में आज भारत में लगभग हर जगह विंशोत्तरी दशा का ही उपयोग होता है — 120 वर्षों का वह चक्र जो नौ ग्रहों में बँटा है।
यह मार्गदर्शिका बताती है कि विंशोत्तरी दशा क्या है, जन्म के समय आपका अपना क्रम कैसे तय होता है, महादशा अंतर्दशाओं में कैसे बँटती है, ज्योतिषी किसी दशा को वास्तव में कैसे पढ़ते हैं, और उपाय कब बताए जाते हैं।
दशा क्या होती है
दशा एक ग्रह-काल है: वर्षों का वह खंड जिस पर एक ग्रह का शासन होता है, और जिसमें आपकी कुंडली में उस ग्रह का वादा पूरा होता है। शब्द का अर्थ है 'अवस्था' या 'स्थिति'। अपनी दशा में ग्रह ज़्यादा बलवान या कमज़ोर नहीं हो जाता; उसे बस बोलने का अवसर मिलता है। वह क्या कहेगा, यह पूरी तरह इस पर निर्भर है कि वह आपकी कुंडली में कहाँ बैठा है, किन भावों का स्वामी है और कितनी अच्छी स्थिति में है।
विंशोत्तरी का अर्थ है 'एक सौ बीस'। यह पद्धति इन 120 वर्षों को नौ ग्रहों में तय हिस्सों में बाँटती है, हमेशा एक ही क्रम में, और यह क्रम कभी नहीं बदलता: केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, और फिर से केतु।
| महादशा | अवधि | इस ग्रह के नक्षत्र |
|---|---|---|
| केतु महादशा | 7 वर्ष | अश्विनी, मघा, मूल |
| शुक्र महादशा | 20 वर्ष | भरणी, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा |
| सूर्य महादशा | 6 वर्ष | कृत्तिका, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा |
| चंद्र महादशा | 10 वर्ष | रोहिणी, हस्त, श्रवण |
| मंगल महादशा | 7 वर्ष | मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा |
| राहु महादशा | 18 वर्ष | आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा |
| गुरु महादशा | 16 वर्ष | पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वा भाद्रपद |
| शनि महादशा | 19 वर्ष | पुष्य, अनुराधा, उत्तरा भाद्रपद |
| बुध महादशा | 17 वर्ष | आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती |
आपकी दशा का क्रम कैसे तय होता है
चक्र में आपकी जगह जन्म नक्षत्र से तय होती है — जन्म के क्षण चंद्रमा जिस नक्षत्र में था। 27 नक्षत्रों में से हर एक का स्वामी नौ ग्रहों में से कोई एक है, हर ग्रह के तीन नक्षत्र, और जन्म के समय वही दशा चल रही होती है जो आपके जन्म नक्षत्र के स्वामी की है।
- जन्म के समय चंद्रमा की स्थिति निकाली जाती है, जिससे नक्षत्र और उसके भीतर का चरण (चौथाई भाग) मिलता है।
- उस नक्षत्र का स्वामी बताता है कि आप किस महादशा में जन्मे हैं। उदाहरण के लिए, रोहिणी, हस्त या श्रवण में जन्मा व्यक्ति चंद्र की महादशा में जन्म लेता है।
- उस दशा का केवल शेष भाग बचता है। यह इस बात से निकाला जाता है कि चंद्रमा को उस नक्षत्र में अभी कितनी दूरी तय करनी थी: गुरु के नक्षत्र में एक चौथाई आगे बढ़ा चंद्रमा गुरु के सोलह वर्षों में से तीन-चौथाई, यानी बारह वर्ष, शेष छोड़ता है।
- उसके बाद दशाएँ जीवन भर विंशोत्तरी के तय क्रम में आती रहती हैं।
अंतर्दशा और उसके नीचे के स्तर
सोलह या बीस वर्ष की महादशा को एक ही चीज़ की तरह पढ़ना संभव नहीं, इसलिए हर महादशा नौ अंतर्दशाओं (उप-दशाएँ, जिन्हें भुक्ति भी कहते हैं) में बँटती है — हर ग्रह की एक। पहली अंतर्दशा स्वयं महादशा के स्वामी की होती है, और फिर वही तय क्रम चलता है। हर अंतर्दशा का हिस्सा 120 में से उसकी अपनी दशा-अवधि के अनुपात में होता है।
| अंतर्दशा स्वामी | अवधि |
|---|---|
| गुरु (स्वयं) | 2 वर्ष 1 महीना 18 दिन |
| शनि | 2 वर्ष 6 महीने 12 दिन |
| बुध | 2 वर्ष 3 महीने 6 दिन |
| केतु | 11 महीने 6 दिन |
| शुक्र | 2 वर्ष 8 महीने |
| सूर्य | 9 महीने 18 दिन |
| चंद्र | 1 वर्ष 4 महीने |
| मंगल | 11 महीने 6 दिन |
| राहु | 2 वर्ष 4 महीने 24 दिन |
ज़्यादातर लोग जिसे "अच्छा साल" या "कठिन साल" कहते हैं, वह असल में अंतर्दशा से पढ़ा जाता है। शुभ महादशा में कठिन अंतर्दशा एक अच्छे दशक में कठिन दौर देती है; कठिन महादशा में मित्र अंतर्दशा लंबे संघर्ष के बीच राहत देती है। पूरे चक्र की सबसे लंबी अंतर्दशा शुक्र में शुक्र की है, 3 वर्ष 4 महीने; सबसे छोटी सूर्य में सूर्य की, 3 महीने 18 दिन।
दशा को वास्तव में कैसे पढ़ा जाता है
कौन-सी दशा चल रही है, यह जानना आसान हिस्सा है। उसका अर्थ क्या होगा, इसके लिए चार और प्रश्न ज़रूरी हैं, और इसीलिए एक ही महादशा में चल रहे दो लोगों के अनुभव बिल्कुल अलग हो सकते हैं:
- दशा स्वामी आपकी कुंडली में किन भावों का स्वामी है? ग्रह उन्हीं भावों के फल देता है जिनका वह स्वामी है। गुरु सबसे बड़ा शुभ ग्रह है, पर वृषभ लग्न के लिए वह कठिन भावों का स्वामी है, और उसकी दशा उसी हिसाब से पढ़ी जाती है।
- वह कहाँ बैठा है, और किसके साथ? उसका भाव, राशि, बल, और जिन ग्रहों से उसकी युति या दृष्टि है। नीच का दशा स्वामी और उच्च का दशा स्वामी बिल्कुल अलग फल देते हैं।
- अंतर्दशा कौन-सी है? उप-दशा स्वामी की अपनी स्थिति और महादशा स्वामी से उसका संबंध दशा के भीतर हर हिस्से का स्वरूप तय करता है।
- गोचर में क्या चल रहा है? दशा बताती है कि फल कब देय है; गोचर बताता है कि वह कब मिलता है। जन्म के चंद्रमा पर शनि का गोचर, साढ़े साती, सबसे ज़्यादा महसूस किया जाता है।
उपाय कब बताए जाते हैं
परंपरा हर दशा के लिए उपाय नहीं बताती। उपाय तब बताए जाते हैं जब दशा स्वामी कुंडली में कमज़ोर, नीच, अस्त या पीड़ित हो, जब वह कठिन भावों का स्वामी हो, या जब कठिन अंतर्दशा और कठिन गोचर एक साथ पड़ें। तब आम तौर पर तीन बातें इसी क्रम में बताई जाती हैं: ग्रह का जप, आपके नाम से दान, और जहाँ कई ग्रह शामिल हों वहाँ शांति।
1.उपाय से पहले दशा को पढ़ें
केवल दशा तालिका से यह पता नहीं चलता कि उपाय ज़रूरी है या नहीं। कुंडली परामर्श में दशा, उसके स्वामी का बल और चल रहे गोचर साथ में देखे जाते हैं, और उसके बाद ही ग्रह, जप संख्या और दान बताया जाता है।
2.दशा स्वामी का जप
जिस ग्रह की दशा चल रही है उसके मंत्र का जप, जो पुरोहित आपके नाम और गोत्र से संकल्प लेकर करते हैं। हर ग्रह की जप संख्या अलग होती है, और वह आपकी कुंडली के आधार पर बताई जाती है।
3.कठिन दौर में दोहराएँ
जहाँ दशा लंबी हो, वहाँ परिवार अक्सर शुरुआत में एक बड़ा उपाय करने के बजाय कठिन अंतर्दशाओं के दौरान छोटा जप या साप्ताहिक दान दोहराते हैं।
नौ महादशाएँ, हर एक पर अलग मार्गदर्शिका
हर महादशा पर अलग लेख है: वह क्या लाती है, उसकी अंतर्दशाएँ और उनकी सटीक अवधि, उसमें परंपरा किन बातों पर ध्यान देती है, और कौन-से उपाय बताए जाते हैं। ये लेख अभी अंग्रेज़ी में हैं।
- केतु महादशा — 7 वर्ष। वैराग्य, अचानक अंत और आध्यात्मिक मोड़।
- शुक्र महादशा — 20 वर्ष। विवाह, सुख-सुविधा, कला, और नौ में सबसे लंबी दशा।
- सूर्य महादशा — 6 वर्ष। पहचान, अधिकार, सरकार और पिता।
- चंद्र महादशा — 10 वर्ष। मन, माता, घर और जनता।
- मंगल महादशा — 7 वर्ष। ऊर्जा, संपत्ति, विवाद और निर्णायक कदम।
- राहु महादशा — 18 वर्ष। महत्वाकांक्षा, विदेश, अचानक उन्नति और उलटफेर।
- गुरु महादशा — 16 वर्ष। शिक्षा, विवाह, संतान, धन और धर्म।
- शनि महादशा — 19 वर्ष। काम, धैर्य, ज़िम्मेदारी और धीमा पर टिकाऊ लाभ।
- बुध महादशा — 17 वर्ष। पढ़ाई, वाणी, व्यापार, अनुबंध और संपर्क।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
विंशोत्तरी दशा क्या होती है?
यह भारतीय ज्योतिष में सबसे ज़्यादा प्रयुक्त ग्रह-दशा पद्धति है। यह 120 वर्षों को नौ ग्रहों में तय हिस्सों में बाँटती है — केतु 7, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19 और बुध 17 वर्ष — हमेशा इसी क्रम में। जन्म के समय कौन-सी दशा चल रही थी, यह जन्म नक्षत्र से तय होता है।
विंशोत्तरी दशा कैसे निकाले?
जन्म के समय चंद्रमा का नक्षत्र निकालें; उस नक्षत्र का स्वामी आपकी पहली महादशा है। चंद्रमा ने नक्षत्र का जितना भाग अभी पार नहीं किया था, उसी अनुपात में उस दशा का शेष बचता है, और उसके बाद दशाएँ तय क्रम में आती हैं। हर अंतर्दशा की अवधि = महादशा के वर्ष × अंतर्दशा स्वामी के वर्ष ÷ 120। व्यवहार में यह तालिका जन्म कुंडली में छपी होती है, या जन्म तिथि, समय और स्थान से ज्योतिषी इसे निकाल देते हैं।
कौन-सी महादशा कितने साल की होती है?
केतु 7 वर्ष, शुक्र 20, सूर्य 6, चंद्र 10, मंगल 7, राहु 18, गुरु 16, शनि 19 और बुध 17 वर्ष। सबसे लंबी शुक्र की है और सबसे छोटी सूर्य की; सब मिलाकर 120 वर्ष।
मेरी कौन-सी दशा चल रही है, यह कैसे पता करें?
दशा तालिका आम तौर पर जन्म के समय बनी कुंडली में छपी होती है। वह न हो, तो जन्म तिथि, सही समय और स्थान से इसे निकाला जा सकता है; ज्योतिषी कुछ भी पढ़ने से पहले यही करते हैं।
एक ही उम्र में मेरी महादशा मेरे दोस्त जैसी क्यों नहीं है?
क्योंकि क्रम जन्म नक्षत्र से शुरू होता है, जन्म से नहीं। एक ही दिन कुछ घंटों के अंतर पर जन्मे दो लोग अलग नक्षत्रों में, और इसलिए अलग दशाओं में अलग शेष के साथ जन्म ले सकते हैं।
सबसे अच्छी महादशा कौन-सी है?
कोई दशा सबके लिए सबसे अच्छी नहीं होती। गुरु और शुक्र स्वाभाविक शुभ ग्रह हैं और उनकी दशाएँ अक्सर सुखद होती हैं, पर फल इस पर निर्भर है कि वे आपकी कुंडली में किन भावों के स्वामी हैं और कितनी अच्छी स्थिति में हैं। अच्छी स्थिति का शनि अपने उन्नीस वर्षों में कमज़ोर गुरु के सोलह वर्षों से बेहतर फल दे सकता है।
दशा और गोचर में क्या अंतर है?
दशा आपकी जन्म कुंडली से आती है और केवल आपकी होती है; गोचर यह है कि इस समय आकाश में ग्रह कहाँ हैं, और वह सबके लिए एक जैसा है। परंपरा दोनों को साथ पढ़ती है: दशा बताती है कि क्या देय है, गोचर बताता है कि वह कब आता है। साढ़े साती गोचर है, दशा नहीं।
क्या हर नई महादशा की शुरुआत में उपाय करना चाहिए?
अपने-आप नहीं। उपाय तब बताए जाते हैं जब दशा स्वामी आपकी कुंडली में कमज़ोर या पीड़ित हो, कठिन भावों का स्वामी हो, या जब कठिन अंतर्दशा कठिन गोचर से मिले। यह कुंडली देखकर तय होता है; केवल नई दशा शुरू होने के कारण रत्न या जप शुरू कर देना सबसे आम गलती है।
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